पैरों की थाप, घुंघरू की झंकार से बनाई अलग पहचान

बस्ती।कप्तानगंज के पास एक छोटे से गांव करनपुर की विन्ध्यवासिनी तिवारी जब तीन साल की थी तभी से कथक नृत्य के प्रति आकर्षित हुई और स्कूलों में होने वाले कार्यक्रमों में कथक नृत्य से अपनी एक अलग पहचान बनाने में जुट गईं। इंटर तक पहुंचते-पहुंचते उन्होंने अपने पैरों की थाप और घुंघरू की झंकार से लोगों को आकर्षित कर लिया।
विन्ध्यवासिनी बताती हैं कि बचपन के शौक ने आज मेरे जीवन में कुछ बेहतर करने का उद्देश्य जागृत कर दिया है। आज के आधुनिक दौर में जहां पाश्चात्य सभ्यता युवा पीढ़ी पर हावी है और वो अश्लील गीतों पर नृत्य कर रहे हैं। वहीं मैं अपनी विलुप्त हो रही कथक के धरोहर को लोगों के बीच में लेकर जाती हूं, उन्हें इसका एहसास कराती हूं कि आज भी कथक नृत्य को हम एक अलग पहचान दिला सकते हैं और आधुनिक गीतों पर डांस करने वालों को भी कथक नृत्य की तरफ प्रेरित कर सकते हैं। बस यही सोचकर अपने गुरु पं. लक्ष्मी प्रसाद मिश्रा से कथक की बारीकियों को सीखते हुए मौका मिला तो मंचों पर प्रस्तुति देने लगी। मेरा सबसे पसंदीदा नृत्य मोहे रंग दो लाल पर नृत्य करना मुझे आज भी काफी अच्छा लगता है। मंच पर प्रस्तुति के दौरान लोग बरबस ही आकर्षित होकर तालियों से मेरो औसला अफजाई करते हैं।


अपने गुरू जी से और सिखा मेमोरियल संगीत संस्थान की डायरेक्टर डॉ. रंजना अग्रहरि की प्रेरणा और उनके प्रोत्साहन का प्रतिफल है कि मैं अपने शहर से निकलकर फैजाबाद और लखनऊ में आयोजित कथक नृत्य प्रतियोगिता में प्रतिभाग कर सकी। यहां पर मुझे बेहत नृत्य के लिए प्रशस्ति पत्र और मेडल देकर सम्मानित भी किया गया। मेरा आज भी कथक नृत्य की बारीकियों को सीखने का क्रम जारी है। क्योंकि कभी भी एक कलाकार अपने आप को पूर्ण नहीं मान सकता है। उसे पूरा जीवन सीखना ही रहता है तभी जाकर वह एक बेहतर कलाकार बनता है। कथक के सहारे पूरे देश के बड़े से बड़े मंचों पर प्रस्तुति करने की योजना है। जिससे हमारे विलुप्त हो रहे कथक को एक बेहतर स्थान मिल सके।

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