सम्पादकीय

विश्व स्वास्थ्य दिवस पर विशेष

हर वर्ष 7 अप्रैल को मनाया जाने वाला विश्व स्वास्थ्य दिवस एक महत्वपूर्ण अवसर है जो समाज में स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए मनाया जाता है इसमें हर स्तर पर देखभाल की आवश्यकता है स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन का वास होता है जो महत्वपूर्ण वैश्विक स्वास्थ्य मुद्दों की ओर आकर्षित करता है स्वास्थ्य प्रत्येक व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार है अच्छे स्वास्थ्य का आरंभ शैशव काल से होता है एक स्वस्थ व्यक्ति ही स्वस्थ समाज का निर्माण कर सकता है इस बार स्वस्थ शुरुआत आशा पूर्ण भविष्य थीम के साथ मातृ एवं शिशु के स्वास्थ्य पर केंद्रित है इसी थीम को लेकर विवेक कुमार ने जब चिकित्सक और समाज के उत्कृष्ट लोगों के विचार जाने तो बड़े ही रोचक तथ्य उभर कर सामने आये।

1. डॉ रश्मि सक्सेना बताती है कि हम विश्व स्वास्थ्य दिवस मना रहे हैं यह स्वीकार करना आवश्यक है कि स्वास्थ्य शरीर से परे भी है-इसमें मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक कल्याण भी शामिल है। सबसे प्रभावशाली क्षेत्र में से एक जहां मानसिक स्वास्थ्य एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है वह है मातृ एवं शिशु देखभाल। एक मां का मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य उसके बच्चे के विकास व्यवहार और दीर्घकालिक मनोवैज्ञानिक कल्याण को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करता है गर्भावस्था और प्रसव शारीरिक और भावनात्मक दोनों तरह से बहुत बड़े बदलाव लाते हैं । हार्मोनल उतार-चढ़ाव जीवन में बदलाव और देखभाल की जिम्मेदारियां मन की मानसिक स्थिति को प्रभावित कर सकती है कई महिलाओं को अत्यधिक तनाव मूड में बदलाव और कुछ मामलों में प्रसवोत्तर अवसाद का अनुभव होता है। जब इलाज नहीं किया जाता है तो यह स्थितियां मां बच्चों के बंधन में बाधा डाल सकती है जिससे दोनों के सेहत पर असर पड़ता है। एक मां जो अच्छे मानसिक स्वास्थ्य को बनाए रखती है उसके भावनात्मक रूप से उपस्थित रहने पालन पोषण करने और उत्तरदायी होने की संभावना अधिक होती है जो बच्चे के संज्ञानात्मक और भावनात्मक विकास को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण कारक है। इसके विपरीत मातृ तनाव और अवसाद बच्चों में व्यावहारिक और विकासात्मक चुनौतियों के जोखिम को बढ़ा सकता है जिसमें चिंता और ज्ञान संबंधी कठिनाइयां और कम शैक्षणिक प्रदर्शन भी शामिल है। जन्म से ही बच्चे भावनात्मक सुरक्षा और जुड़ाव पर निर्भर रहते हैं मां और बच्चे के बीच एक मजबूत रिश्ता विश्वास आत्मसम्मान और सुरक्षा की नींव रखता है। लगातार प्यार ध्यान और देखभाल सुरक्षित लगाव बनाने,भविष्य के रिश्तों और मानसिक स्वास्थ्य को आकार देने में मदद करती है।

2. सौमिल फार्मास्यूटिकल्स और बेसिल लैब की प्रोपराइटर कविता शुक्ला का कहना है कि विश्व स्वास्थ्य दिवस जो हर साल 7 अप्रैल को मनाया जाता है इस साल स्वस्थ शुरुआत आशा पूर्ण भविष्य थीम के साथ मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य पर केंद्रित है जो इन दोनों के स्वास्थ्य और जीवन रक्षा को बढ़ावा देने के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर है इसके अंतर्गत स्थल कुछ मूलभूत कारणो पर विशेष ध्यान दिया गया है। सभी महिलाओं को गर्भावस्था में प्रसव पूर्व देखभाल उत्सव के दौरान कुशल देखभाल और पशुओं के बाद कई सप्ताह तक देखभाल और सहायता की जरूरत होती है। साथ ही सभी प्रसवो मे कुशल स्वास्थ्य पेशेवरों द्वारा सहायता मिलनी चाहिए क्योंकि समय पर सहायता और उपचार मिलना मां और बच्चे दोनों के लिए जीवन मृत्यु का अंतर हो सकता है। इसी के तहत जीवन शिशु सुरक्षा कार्यक्रम की शुरुआत की गई है इस योजना के तहत महिलाओं और बच्चों के लिए निःशुल्क मातृ सेवाओं आपातकालीन रेफरल प्रणाली को राष्ट्रव्यापी पैमाने पर ले जाना और मातृ मृत्यु लेखा परीक्षा और सभी स्तरों पर स्वास्थ्य सेवाओं के प्रबंधन में सुधार लाना है। मातृ स्वास्थ्य में सुधार लाने और महिलाओं को जीवन बचाने की वैश्विक लक्ष्य प्राप्त करने के लिए हमें उन महिलाओं तक पहुंचाने के ज्यादा प्रयास करने होंगे जिन्हें ज्यादा जरूरत है। इसमें ग्रामीण क्षेत्रो स्लम गरीब घरों की महिलाएं शामिल है।

3. विनायक हॉस्पिटल की डॉक्टर सविता भट्ट कहती हैं कि विश्व स्वास्थ्य दिवस तो हर वर्ष मनाया जाता है जिसमें हर वर्ष किसी न किसी थीम पर चर्चा होती है हम लोग चर्चा इसलिए करते हैं ताकि उसे पर अमल कर सकें। इस बार की थीम है मातृ एवं नवजात शिशु की देखभाल। पहली बात तो यह है कि जब मन स्वस्थ होगी तभी बच्चा भी स्वस्थ पैदा होगा। लड़कियों को अपने खान-पान पर विशेष ध्यान देना चाहिए क्योंकि लड़कियों की शादी के बाद उन्हें मां बनना है लड़कियों को जब उन्हें लगे कि वह बिल्कुल स्वस्थ है तभी बच्चे पैदा करें। और अगर मां बनने भी वाली है तो उन्हें डॉक्टर से रेगुलर चेकअप करना चाहिए। ताकि उन्हें सही सलाह मिल सके। बच्चे को कम से कम 6 माह तक मां का दूध पिलाना चाहिए। पैदा होते ही बच्चे को टीके अवश्य लगवाना चाहिए। तभी बच्चा स्वस्थ रहता है। अगर मां -बच्चे दोनों स्वस्थ रहना चाहते हैं तो उन्हें स्वास्थ्य के हर नियम का पालन तो करना ही होगा।

4. डॉ ज्योति दुबे ख्यातिलब्ध एक मनोवैज्ञानिक है वह कहती हैं कि शारीरिक रूप से स्वस्थ होने के साथ-साथ मानसिक व सामाजिक रूप से फिट होना भी जरूरी है और हमें स्वस्थ रहने के लिए एक परिवार व समाज दोनों की आवश्यकता होती है। हमारे परिवार के मुख्य सदस्यों विशेष कर माता को शिशुओं के स्वास्थ्य से शुरुआत करनी होगी। तभी यह विश्व का कल्याण व स्वस्थ होना संभव है जैसे बिना पेट्रोल के गाड़ी नहीं चल सकती वैसे ही ग्रहणी का माता के बिना परिवार का स्वस्थ होना संभव नहीं है। हमें सर्वप्रथम माताओ व शिशुओं के शारीरिक मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखना अति आवश्यक है। बच्चा प्रत्येक चीज अपने माता-पिता से ही सीखता है। उन्हें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि बच्चों का पालन पोषण करते वक्त उसकी डाइट उसके आसपास का वातावरण स्वस्थ व खुशहाल होना चाहिए खासकर महिलाओं को। क्योंकि अगर महिलाएं सेहतमंद नहीं होगी तो परिवार का ध्यान कैसे रखेंगी।

5. विश्व स्वास्थ्य दिवस के अवसर पर मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य पर माया आनंद का मानना है कि विश्व स्वास्थ्य दिवस सिर्फ एक दिन ही नहीं बल्कि हमें यह सोचने और संकल्प लेने का अवसर देता है कि हम अपने समाज को कैसे अधिक स्वस्थ जागरूक और सशक्त बना सकते हैं। मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य एक ऐसा विषय है जो हमारे सामाजिक विकास की नीव है। एक मां का स्वास्थ्य न केवल उसके स्वयं के लिए बल्कि उसके बच्चे के भविष्य और संपूर्ण परिवार की खुशहाली के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। गर्भावस्था के दौरान उचित पोषण नियमित चिकित्सा जांच मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल और सुरक्षित प्रसव जैसे पहलू बेहद जरूरी है। इसके साथ ही जन्म के बाद शिशु को समय पर टीकाकरण स्तनपान और स्वच्छता जैसी मूलभूत ज़रूरतें पूरी होनी चाहिए। दुर्भाग्यवश आज भी हमारे समाज के कई हिस्सों में महिलाओं को आवश्यक स्वास्थ्य सेवाएं समय पर नहीं मिल पाती जिससे मातृ मृत्यु दर और शिशु मृत्यु दर जैसी चिंताजनक स्थितियां उत्पन्न होती हैं। हमें यह समझना होगा कि मातृत्व तो एक सम्मानजनक अनुभव है ना कि एक जोखिम। इसके लिए सरकारी योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन के साथ-साथ सामाजिक जागरूकता और संवेदनशीलता की भी आवश्यकता है। आइडियल ग्रुप ऑफ़ कॉलेजेस में हमारा विश्वास है कि शिक्षा के साथ-साथ स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी योगदान देना हमारी जिम्मेदारी है। इस अवसर पर मैं सभी संस्थानों परिवारों और नागरिकों से अपील करती हूं कि वे मिलकर ऐसा वातावरण बनाएं जहां हर मां को संपूर्ण देखभाल और हर शिशु को स्वस्थ जीवन की अच्छी शुरुआत मिल सके। एक स्वस्थ मां ही एक सशक्त समाज की जननी होती है इस लिए हम सब मिलकर इस दिशा में अपना योगदान दें।

6. कानपुर की पूनम अवस्थी एक अध्यापिका है वह बताती है कि मां और शिशु की देखभाल जीवन की शुरुआत में स्वस्थ और खुशहाल जीवन के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। प्रसव पूर्व देखभाल स्तनपान नियमित स्वास्थ्य जांच मां और बच्चे दोनों के लिए आवश्यक है मातृत्व देखभाल से तात्पर्य गर्भावस्था प्रसव और प्रसवोत्तर अवधि के दौरान महिलाओं भागीदारों परिवार और बच्चों को प्रदान की जाने वाली स्वास्थ्य सेवा से है। स्वस्थ शिशुओं को कई प्रकार से देखभाल की आवश्यकता होती है ताकि उनका सामान्य विकास सुनिश्चित हो सके और स्वास्थ्य बेहतर बना रहे जब माता एवं शिशु स्वस्थ एवं खुश रहेंगे तो घर परिवार एवं समाज भी स्वस्थ एवं खुश रहेगा। मां के लिए यह जरूरी है कि वह अपने शरीर की देखभाल करें ताकि वह अपने बच्चे को स्वस्थ रख सके। अच्छे खान-पान और मानसिक स्थिति का भी बहुत महत्व है। एक बात जरूर कहूंगी कि मातृत्व के पूर्व व बाद में भी समुचित पोषण मां व शिशु के लिए चलते रहना चाहिए। जिसका दीर्घकालिक सामाजिक प्रभाव भी होता है।

7. सुप्रसिद्ध कथक नृत्यांगना डॉ मनीषा मिश्रा बताती हैं कि हमारा स्वास्थ्य ईश्वर द्वारा देय वरदान नहीं है। हम ही इसके निर्माता हैं। इसलिए हमें अपने आचार विचार और खान-पान पर विशेष ध्यान देना चाहिए और जहां तक हो सके अच्छे लोगों की संगति में बैठकर सुस्वास्थ्य को बनाना चाहिए। जिस प्रकार गाड़ी को चलाने के लिए इंजन की आवश्यकता होती है इस प्रकार शरीर को चलाने के लिए अच्छे स्वास्थ्य की आवश्यकता होती है इसलिए विद्वान अरस्तु ने कहा है कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क निवास करता है। अतः स्वास्थ्य का हमारे जीवन में उतना ही महत्व है जितना की एक नौका को चलाने के लिए पतवार का। मातृ और शिशु की देखभाल में सबसे महत्वपूर्ण है सही समय पर चिकित्सा सहायता प्राप्त करना। एक स्वस्थ मां स्वस्थ बच्चे को जन्म देती है। यही कारण है कि हमें नियमित प्रसव पूर्व जांच और टीकाकरण को प्राथमिकता देनी चाहिए। अपने अनुभव से कहती हूं कि मातृत्व शिशु की देखभाल बहुत भावनात्मक आनंद का अनुभव होना चाहिए।

प्रस्तुति- विवेक कुमार

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