सुरक्षा एजेंसियों को बड़ी सफलता मिली जब मोस्ट वॉन्टेड माओवादी बारसे देवा ने हथियारों सहित आत्मसमर्पण किया।

मोस्ट वॉन्टेड माओवादी बारसे देवा का आत्मसमर्पण: सुरक्षा बलों के लिए बड़ी कामयाबी
माओवादी हिंसा के खिलाफ चल रही लड़ाई में सुरक्षा बलों को एक बड़ी सफलता हाथ लगी है। माओवादी आंदोलन के सबसे कुख्यात और मोस्ट वॉन्टेड नेताओं में शामिल बारसे देवा उर्फ सुक्का ने शनिवार को तेलंगाना पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। उसके साथ उसके 21 अन्य साथी भी मुख्यधारा में लौट आए। इस समर्पण को माओवादी नेटवर्क के लिए बड़ा झटका और सुरक्षा एजेंसियों के लिए रणनीतिक जीत माना जा रहा है।
पीएलजीए-एक का प्रमुख था बारसे देवा
बारसे देवा माओवादी संगठन के सबसे हिंसक सशस्त्र दस्ते पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (PLGA) की यूनिट-एक का प्रमुख था। यह दस्ता सुरक्षा बलों पर हमलों, घात लगाकर की गई फायरिंग और हथियार लूट की घटनाओं के लिए जाना जाता है। बारसे देवा लंबे समय से पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियों की मोस्ट वॉन्टेड सूची में शामिल था। उसके सिर पर भारी इनाम घोषित था और वह कई बड़े नक्सली हमलों का मास्टरमाइंड माना जाता रहा है।
21 साथियों के साथ किया आत्मसमर्पण
शनिवार को तेलंगाना में हुए इस आत्मसमर्पण के दौरान बारसे देवा ने अपने 21 साथियों के साथ हथियार डाल दिए। सभी ने माओवादी विचारधारा से अलग होने और हिंसा का रास्ता छोड़ने की घोषणा की। पुलिस अधिकारियों के अनुसार, यह आत्मसमर्पण किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे नेटवर्क के टूटने का संकेत है, क्योंकि इसके साथ ही एक संगठित सशस्त्र समूह निष्क्रिय हो गया।
48 हथियार पुलिस के हवाले
आत्मसमर्पण के दौरान माओवादियों ने कुल 48 हथियार सौंपे। इनमें अत्याधुनिक इजरायली टावोर राइफल, अमेरिकी निर्मित कोल्ट ऑटोमैटिक राइफल, एके-47, इंसास राइफल और सेल्फ लोडिंग राइफल (SLR) शामिल हैं। पुलिस के अनुसार, टावोर राइफल स्वयं बारसे देवा के पास थी, जो उसकी ताकत और संगठन में उसकी अहम भूमिका को दर्शाती है।
टावोर और कोल्ट जैसे आधुनिक हथियार
इजरायल में विकसित टावोर राइफल आधुनिक युद्ध तकनीक का प्रतीक मानी जाती है। इसकी सटीक निशानेबाजी, हल्का वजन और कॉम्पैक्ट डिजाइन इसे घने जंगलों और गुरिल्ला युद्ध के लिए उपयुक्त बनाता है। वहीं, अमेरिकी कोल्ट ऑटोमैटिक राइफल 5.56 मिमी नाटो कैलिबर की है, जिसकी फायर रेट तेज और रेंज लंबी होती है। ऐसे हथियारों का माओवादियों के पास होना सुरक्षा एजेंसियों के लिए लंबे समय से चिंता का विषय रहा है।
माओवादियों तक कैसे पहुंचे ये हथियार?
पुलिस और खुफिया एजेंसियों का मानना है कि ये अत्याधुनिक हथियार माओवादियों ने सीधे अंतरराष्ट्रीय बाजार से नहीं खरीदे, बल्कि सुरक्षा बलों के साथ हुई मुठभेड़ों में लूटे गए। पिछले कुछ वर्षों में माओवादी हमलों के दौरान जवानों से हथियार छीने जाने की कई घटनाएं सामने आई हैं। बरामद हथियार इस बात का प्रमाण हैं कि माओवादी संगठन सुरक्षा बलों को निशाना बनाकर अपनी ताकत बढ़ाने की कोशिश करता रहा है।
बस्तर रेंज में हथियार बरामदगी का रिकॉर्ड
इस आत्मसमर्पण के साथ एक और महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया है। इस वर्ष बस्तर रेंज में अब तक कुल 677 हथियार बरामद किए जा चुके हैं, जो किसी एक वर्ष में सबसे अधिक हैं। यह आंकड़ा दर्शाता है कि सुरक्षा बलों की रणनीति और लगातार चलाए जा रहे ऑपरेशनों से माओवादी नेटवर्क कमजोर पड़ा है। हथियारों की इतनी बड़ी संख्या में बरामदगी से माओवादियों की सैन्य क्षमता पर सीधा असर पड़ा है।
आत्मसमर्पण नीति का असर
विशेषज्ञों का मानना है कि बारसे देवा जैसे बड़े नेता का आत्मसमर्पण सरकार की पुनर्वास और आत्मसमर्पण नीति की सफलता को भी दर्शाता है। लगातार दबाव, जंगलों में बढ़ते ऑपरेशन, संचार नेटवर्क का टूटना और संगठन के भीतर असंतोष ने माओवादियों को हिंसा छोड़ने के लिए मजबूर किया है। आत्मसमर्पण करने वालों को मुख्यधारा में लाने और पुनर्वास की सुविधा देने से अन्य माओवादियों को भी संदेश जाता है कि हिंसा के अलावा भी रास्ता मौजूद है।
सुरक्षा एजेंसियों के लिए मनोवैज्ञानिक जीत
बारसे देवा का आत्मसमर्पण केवल एक रणनीतिक नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक जीत भी है। माओवादी संगठन में उसकी मजबूत पकड़ थी और वह लड़ाकों के लिए प्रेरणास्रोत माना जाता था। उसके आत्मसमर्पण से संगठन के निचले स्तर के कैडरों का मनोबल कमजोर पड़ सकता है, जिससे भविष्य में और समर्पण की संभावना बढ़ जाती है।
माओवादी आंदोलन के भविष्य पर असर
विश्लेषकों के अनुसार, लगातार हो रहे आत्मसमर्पण और हथियारों की बरामदगी से माओवादी आंदोलन अपने अंतिम चरण की ओर बढ़ता दिख रहा है। हालांकि खतरा पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है, लेकिन नेतृत्व की कमजोर होती पकड़ और संसाधनों की कमी से संगठन की क्षमता घट रही है।
निष्कर्ष
मोस्ट वॉन्टेड माओवादी नेता बारसे देवा उर्फ सुक्का का 21 साथियों सहित आत्मसमर्पण और 48 हथियारों की बरामदगी देश की आंतरिक सुरक्षा के लिहाज से एक बड़ी उपलब्धि है। यह घटना दिखाती है कि सुरक्षा बलों की लगातार कार्रवाई और सरकार की नीतियां रंग ला रही हैं। आने वाले समय में ऐसे और आत्मसमर्पण माओवादी हिंसा को पूरी तरह खत्म करने की दिशा में निर्णायक साबित हो सकते हैं।




