बंगाल चुनाव में क्यों विफल हो जाती है मुसलमानों की गोलबंदी? समझिए पूरा चुनावी गणित

बंगाल विधानसभा चुनावों में मुसलमानों की राजनीतिक गोलबंदी अक्सर चुनावी समीकरणों को बदलने में विफल रहती है। हुमायूं कबीर और अब्बास सिद्दीकी जैसे नेताओं के प्रयासों के बावजूद, मुस्लिम वोटिंग पैटर्न दशकों से स्थिर रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि धार्मिक अपील से अधिक संगठनात्मक क्षमता, गठबंधन प्रबंधन और बूथ स्तर पर वोटों का हस्तांतरण निर्णायक होता है। पूरे बंगाल में स्वीकार्य मुस्लिम नेता की कमी भी इसका एक प्रमुख कारण है।
बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले तृणमूल कांग्रेस के अल्पसंख्यक वोट बैंक में सेंध लगाने के पार्टी के निलंबित विधायक हुमायूं कबीर के प्रयास के बाद एक बार फिर मुसलमानों की सामाजिक-राजनीतिक गोलबंदी का दौर देखने को मिल रहा है।
हालिया कुछ वर्षों में इससे पहले भी मुसलमानों की गोलबंदी हो चुकी है, लेकिन कभी भी चुनाव परिणामों में कोई बड़ा बदलाव नहीं दिखा। इस तरह के उतार-चढ़ाव होते रहते हैं, लेकिन बंगाल में अल्पसंख्यकों का वोट देने का तरीका दशकों से अपेक्षाकृत स्थिर बना हुआ है, जो न तो धार्मिक करिश्मे से और न ही प्रतीकात्मक बयानों से च्यादा प्रभावित हुआ है।
साल 2016 में मौलवी तोहा सिद्दीकी और 2021 में अब्बास सिद्दीकी जैसी राजनीतिक हस्तियां भी चुनावी प्रचार के दौरान जनसैलाब जुटाने में सफल रही थीं, जबकि फिलहाल कबीर की बयानबाजी को देखते हुए भी मुस्लिम राजनीति में एक नया राजनीतिक नेतृत्व खड़ा होने का दावा किया जा रहा है।
अब्बास सिद्दीकी की राजनीतिक शुरुआत से लेकर कबीर के राजनीतिक प्रयास तक, बंगाल में मुस्लिम-केंद्रित पहलों में एक समानता रही है। ये पहल चुनावों से पहले चरम पर पहुंच जाती हैं, बहस तेज होती हैं, लेकिन अंत में वोटिंग पैटर्न में कोई बड़ा बदलाव नहीं होता।
धार्मिक प्रभाव से प्रेरित चुनावी मुहिम वोटों के मामले में बदलाव लाने में असफल रही हैं, क्योंकि बूथ स्तर पर संगठन, गठबंधन की प्रबंधन क्षमता और वोट स्थानांतरित करने का खेल निर्णायक साबित हुआ है। विश्लेषकों और नेताओं का मानना है कि यह स्थिति नेतृत्व की विफलता नहीं, बल्कि संगठन की सीमाओं की वजह से पैदा होती है।
धार्मिक नेता वोटों को सीटों में बदलने में सक्षम नहीं होते
राजनीतिक विश्लेषक मोईदुल इस्लाम ने कहा कि धार्मिक नेता भावनाओं को प्रभावित कर सकते हैं, लेकिन वे वोटों को सीटों में बदलने में सक्षम नहीं होते। मतदाताओं के मन में सीधा सा सवाल होता है- कौन जीत सकता है और कौन भाजपा को रोक सकता है। साल 2021 के चुनाव से पहले अब्बास सिद्दीकी ने इंडियन सेक्युलर फ्रंट (आइएसएफ) का गठन कर वामपंथी दलों और कांग्रेस के साथ गठबंधन किया।
माना जा रहा था कि यह दल टीएमसी का गणित बिगाड़ सकता है। लेकिन यह केवल एक सीट जीत सका। इससे बंगाल की राजनीति में एक बार फिर यह साबित हो गया कि केवल प्रचार से चुनावी सफलता नहीं मिलती। राज्यव्यापी संगठन की कमी और विश्वसनीय सामुदायिक अपील के अभाव के कारण ऐसी लामबंदियां कमजोर पड़ जाती हैं। बंगाल में चुनावी गणित महत्वपूर्ण होता है।
जब तक मुसलमानों के नेतृत्व वाला कोई मजबूत संगठन नहीं बनता, तब तक ये सारी बहसें और लामबंदी सिर्फ चर्चा तक ही सीमित रहेंगी, इससे चुनावी नतीजे नहीं बदलेंगे। एक तरफ नेता उभरते हैं और बहसें होती हैं, तो दूसरी ओर अल्पसंख्यक वोट अपनी जगह पर स्थिर रहता है। यहां चुनावी गणित से ही फैसला होता है, बयानबाजियों या प्रचार से नहीं।
कोई मुस्लिम नेता नहीं जिसकी पूरे बंगाल में स्वीकार्यता मिली हो
सामाजिक शोधकर्ता साबिर अहमद ने कहा कि बंगाल में कांग्रेस के दिग्गज नेता एबीए गनी खान चौधरी के बाद कोई ऐसा मुस्लिम नेता नहीं उभरा है, जिसे पूरे बंगाल में स्वीकार्यता मिली हो। उन्होंने कहा कि आज कोई ऐसा मुस्लिम नेता नहीं है जिसकी पूरे बंगाल में अपील हो और जो गहरी संगठनात्मक समझ व प्रशासनिक क्षमता रखता हो। इसके बिना धार्मिक लामबंदी कमजोर रहती है।
अल्पसंख्यक मतदाताओं का लंबा राजनीतिक इतिहास भी है। स्वतंत्रता से पहले, मुसलमान कांग्रेस, कृषक प्रजा पार्टी और मुस्लिम लीग में बंटे हुए थे। विभाजन के बाद, मुसलमान कांग्रेस में गए, फिर वामपंथियों के पास और बाद में टीएमसी का रुख किया। अहमद ने कहा कि यहां के मुसलमानों ने देखा है कि अन्य राज्यों में वोटों के बंटवारे के कारण क्या हुआ। इसी डर की वजह से मुसलमान आगे नहीं सोच पाते हैं।




