GDP की जगह लेगा NDP? मोदी सरकार बदल सकती है देश की तरक्की का पैमाना; ये क्या है और क्यों पड़ रही इसकी जरूरत

GPD vs NDP: मोदी सरकार देश की आर्थिक प्रगति मापने के लिए जीडीपी की जगह एनडीपी (नेट डोमेस्टिक प्रोडक्ट) को मुख्य संकेतक बनाने पर विचार कर रही है। यह बदलाव अर्थव्यवस्था की अधिक वास्तविक तस्वीर पेश करेगा, क्योंकि एनडीपी में मशीनों के घिसाव और प्राकृतिक संसाधनों की कमी को भी शामिल किया जाता है। इसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप टिकाऊ विकास पर ध्यान केंद्रित करना है। इससे आम लोगों पर सीधा असर नहीं होगा, पर नीतियां दीर्घकालिक तरक्की पर केंद्रित होंगी।
HighLights
- GDP की जगह NDP को मुख्य आर्थिक संकेतक बनाने पर विचार
- एनडीपी में मशीनों के घिसाव और संसाधनों की कमी शामिल
- टिकाऊ विकास और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप होगा बदलाव
देश की तरक्की अब सिर्फ जीडीपी (GDP) से नहीं, बल्कि एक नए पैमाने से नापी जा सकती है। और वो है- मोदी सरकार इसी दिशा में बड़ा कदम उठाने की तैयारी में है। अब सवाल यह है कि आखिर यह बदलाव क्यों हो रहा है, इसका मतलब क्या है और आम आदमी की जिंदगी पर इसका क्या असर पड़ेगा?
दरअसल, अब तक जब भी भारत की अर्थव्यवस्था की चर्चा होती थी, तो जीडीपी यानी सकल घरेलू उत्पाद (Gross domestic product) सबसे बड़ा पैमाना माना जाता था। लेकिन अब सरकार GDP की जगह NDP (नेट डोमेस्टिक प्रोडक्ट) को ज्यादा अहम संकेतक बनाने पर विचार कर रही है। ईटी की रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार इस बदलाव को अंतरराष्ट्रीय मानकों के मुताबिक लागू करना चाहती है।
GDP क्या है, जिसे हम सालों से सुनते आ? (What is GDP)
GDP का मतलब है- एक साल में देश के भीतर पैदा होने वाले सभी सामान और सेवाओं की कुल कीमत। इसमें फैक्ट्रियों का उत्पादन, किसानों की फसल, दुकानों और होटलों की कमाई, ट्रांसपोर्ट और सर्विस सेक्टर सब शामिल होता है। GDP ग्रोथ से पता चलता है कि अर्थव्यवस्था कितनी तेजी से आगे बढ़ रही है।
हालिया आंकड़े बताते हैं कि भारत की GDP ग्रोथ मजबूत रही है। वित्त वर्ष 2025-26 की दूसरी तिमाही यानी 1 जुलाई 2025-30 सितंबर 2025 के बीच GDP ग्रोथ 8.2% दर्ज की गई। वहीं भारतीय रिजर्व बैंक ने पूरे वित्त वर्ष 2025-26 के लिए GDP ग्रोथ करीब 7.3% रहने का अनुमान दिया है।
फिर NDP क्या है और इसमें नया क्या है? (What is NDP)
GDP सिर्फ उत्पादन की कुल वैल्यू बताती है, लेकिन यह नहीं बताती कि इस उत्पादन की कीमत क्या चुकाई गई। मशीनों की टूट-फूट, फैक्ट्रियों का घिसना और कोयला, तेल, खनिज जैसे प्राकृतिक संसाधनों की कमी, इन सबको GDP नजरअंदाज कर देता है।
NDP इन्हीं चीजों को घटाकर निकाला जाता है। यानी GDP में से मशीनों के घिसने (Depreciation) और संसाधनों की कमी को घटाने के बाद जो असली तस्वीर सामने आती है, वही NDP है। इसे यूं समझिए कि कमाई कितनी हुई, ये GDP बताता है। लेकिन असल में जेब में कितना बचा, ये NDP दिखाता है।
सरकार GDP से NDP की ओर क्यों बढ़ रही है?
भारत अभी GDP के साथ-साथ NDP के आंकड़े जारी करता है, लेकिन तिमाही आंकड़े सिर्फ GDP के ही आते हैं। अब सरकार चाहती है कि NDP को भी मुख्य आर्थिक संकेतक बनाया जाए, ताकि विकास की ज्यादा हकीकतपरक तस्वीर सामने आए।
सरकार संयुक्त राष्ट्र के सिस्टम ऑफ नेशनल अकाउंट्स (SNA) के मुताबिक अपने नेशनल अकाउंट्स को अपडेट करना चाहती है। यह एक वैश्विक ढांचा है, जिससे सभी देश एक जैसे नियमों के तहत अपनी अर्थव्यवस्था का हिसाब रखें। इस प्रक्रिया में सांख्यिकी मंत्रालय काम कर रहा है और एक सब-कमेटी भी बनाई गई है। अधिकारियों के मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के दिशा-निर्देशों के अनुसार इसे वित्त वर्ष 2029-30 तक लागू करने का लक्ष्य है।
तो क्या GDP का बेस ईयर भी बदलेगा?
सिर्फ पैमाना ही नहीं, गणना का आधार भी बदलेगा। अभी GDP की गणना 2011-12 के बेस ईयर पर होती है। सरकार इसे बदलकर 2022-23 करने जा रही है, ताकि आज की अर्थव्यवस्था की सही तस्वीर दिखे। नई GDP सीरीज 27 फरवरी को जारी होने की संभावना है।
आम लोगों पर क्या असर होगा?
इस बदलाव से टैक्स या सैलरी तुरंत नहीं बदलेगी, लेकिन सरकार की नीतियां ज्यादा टिकाऊ विकास पर फोकस करेंगी। यानी सिर्फ तेज ग्रोथ नहीं, बल्कि लंबे समय तक चलने वाली तरक्की को तरजीह मिलेगी।




