मुंबई

बीएमसी चुनाव: भाषा से आगे बढ़ी मुंबई की राजनीति

बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) चुनावों के नतीजों ने यह साफ कर दिया है कि मुंबई की राजनीति अब केवल भाषा और क्षेत्रीय पहचान तक सीमित नहीं रही। दशकों तक ‘मराठी मानुष’ की राजनीति शहर की सत्ता का प्रमुख आधार मानी जाती थी, लेकिन इस बार चुनाव परिणामों ने इस धारणा को कमजोर कर दिया। ठाकरे बंधुओं—उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे—द्वारा मराठी अस्मिता को केंद्र में रखकर किए गए चुनाव प्रचार के बावजूद, बीएमसी में गैरमराठी प्रतिनिधित्व रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया।

🔹 चुनावी रणनीति और मराठी मुद्दा

चुनाव से पहले ठाकरे बंधुओं ने मराठी भाषा, संस्कृति और मुंबई को महाराष्ट्र से अलग करने के कथित खतरे को प्रमुख मुद्दा बनाया। भाजपा पर आरोप लगाया गया कि वह किसी गैरमराठी को मुंबई का मेयर बनाना चाहती है। इस दावे के जरिए मराठी मतदाताओं को एकजुट करने की कोशिश की गई, लेकिन महानगर की जमीनी हकीकत इससे अलग निकली।

🔹 नतीजों में दिखा सामाजिक बदलाव

227 सदस्यीय बीएमसी में इस बार 80 गैरमराठी पार्षद चुनकर आए हैं, जो अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा है। 2017 में यह संख्या 72 थी। यह वृद्धि दर्शाती है कि मुंबई की जनता अब अधिक समावेशी सोच के साथ मतदान कर रही है। गैरमराठी समुदायों की बढ़ती राजनीतिक भागीदारी ने चुनावी परिणामों को नई दिशा दी है।

🔹 किसे हुआ फायदा

गैरमराठी पार्षदों में सबसे अधिक भाजपा से चुने गए हैं। इसके अलावा कांग्रेस, एआईएमआईएम और समाजवादी पार्टी के भी अधिकांश प्रतिनिधि गैरमराठी समुदाय से हैं। इन दलों ने विविध सामाजिक वर्गों को टिकट देकर बहुभाषिक मुंबई की सच्चाई को स्वीकार किया, जिसका उन्हें चुनावी लाभ मिला।

🔹 मराठी राजनीति की चुनौतियां

मराठी पहचान को अपनी राजनीति का केंद्र बनाने वाली शिवसेना (यूबीटी), शिंदे गुट की शिवसेना और मनसे को इस चुनाव में मराठी वोट बैंक के बिखराव का सामना करना पड़ा। एकजुट समर्थन न मिलने से इन दलों की स्थिति कमजोर हुई और वे अपेक्षित प्रभाव नहीं छोड़ सके।

🔹 मुंबई का महानगरीय चरित्र

मुंबई देश की आर्थिक राजधानी होने के साथ-साथ एक वैश्विक महानगर भी है। यहां विभिन्न भाषाओं, संस्कृतियों और समुदायों के लोग रहते हैं। ऐसे शहर में मतदाता अब भावनात्मक नारों की बजाय विकास, प्रशासन और जीवन स्तर से जुड़े मुद्दों को प्राथमिकता देने लगे हैं।

🔹 निष्कर्ष

बीएमसी चुनावों के नतीजे यह संकेत देते हैं कि मुंबई की राजनीति अब एक परिपक्व और समावेशी दिशा में आगे बढ़ रही है। भाषा आधारित राजनीति का प्रभाव घट रहा है, जबकि व्यापक प्रतिनिधित्व और ‘मुंबईकर’ पहचान मजबूत हो रही है। आने वाले समय में वही राजनीतिक दल सफल होंगे जो इस बदलते सामाजिक और राजनीतिक यथार्थ को समझकर अपनी रणनीति तय करेंगे।

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