वनवासियों की शिक्षा और महिला सशक्तीकरण के लिए डॉ. बुदरी ताती को मिला सम्मान, 4 दशक से कर रहीं सेवा

दंतेवाड़ा, छत्तीसगढ़ की डॉ. बुदरी ताती को चार दशकों की समर्पित समाजसेवा के लिए पद्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। उन्होंने आदिवासी कल्याण, बालिका शिक्षा और महिला सशक्तीकरण के लिए अथक कार्य किया, अशिक्षा व नशाखोरी से लड़ाई लड़ी।
HighLights
- डॉ. बुदरी ताती को समाजसेवा के लिए पद्म पुरस्कार मिला।
- चार दशकों से आदिवासी कल्याण और बालिका शिक्षा में समर्पित।
- माओवादी धमकियों के बावजूद महिला सशक्तीकरण हेतु कार्य।
छत्तीसगढ़ में दंतेवाड़ा जिले के गीदम के समीप हीरानार की आदिवासी परिवार में जन्मी डॉ. बुदरी ताती ने करीब चार दशक पूर्व युवावस्था में ही समाजसेवा का मार्ग चुन लिया था। आदिवासी बहुल इस क्षेत्र में व्याप्त अशिक्षा, गरीबी, नशाखोरी और विशेषकर बालिकाओं की दयनीय शैक्षणिक स्थिति ने उन्हें भीतर तक व्यथित कर दिया था।
उन्होंने इन चुनौतियों को स्वीकार करते हुए वनवासी समाज के लिए समर्पित भाव से कार्य शुरू किया और तब से निरंतर सेवा में जुटी हैं। दूरस्थ वनांचलों में सामाजिक बदलाव की नई इबारत लिख रहीं डॉ. बुदरी ताती को समाजसेवा के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए पद्म पुरस्कार से सम्मानित किए जाने की घोषणा की गई है।

महिला सशक्तीकरण के लिए निरंतर प्रयासरत डॉ. बुदरी ताती ने अपना संपूर्ण जीवन वनवासी कल्याण को समर्पित कर दिया है। 61 वर्षीय अविवाहित आदिवासी समाजसेविका अपने नेक कार्यों के कारण माओवादियों की धमकियों का भी सामना कर चुकी हैं, लेकिन उनके कदम कभी डगमगाए नहीं। वह अपने लक्ष्य की राह पर दृढ़ता से आगे बढ़ती रहीं और आज भी उनका सेवा-सफर जारी है।
अब तक वह लगभग छह सौ गांवों का प्रवास कर वनवासियों को जागरूकता और विकास के कार्यों से जोड़ चुकी हैं। वनांचलों में ‘बड़ी दीदी’ के नाम से लोकप्रिय डॉ. बुदरी ताती वर्ष 2005 में माओवादी हिंसा के विरुद्ध चले सलवा जुडूम अभियान के दौरान हिंसा पीड़ितों के लिए संबल बनकर खड़ी रहीं। बालिका शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने बस्तर जिले के भानपुरी में एक आवासीय विद्यालय की स्थापना भी की है।

शासन से सहयोग के बिना बनी लोगों का सहारा
डॉ. बुदरी ताती ने हीरानार में जन सेवा के लिए मां शंखिनी महिला उत्थान संस्था की स्थापना की है। यहां गरीब परिवारों के 30 बच्चे रहते हैं, जिन्हें संस्था में शिक्षा दी जाती है। इसके लिए वह शासन से कोई सहयोग नहीं लेतीं। वर्ष 1984 से 2009 तक वह अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम बारसूर से भी जुड़ी रहीं।
बस्तर में जब छोटी-छोटी आर्थिक गतिविधियों और बचत को बढ़ावा देने महिला स्वयं सहायता समूह की अवधारणा पर काम शुरू नहीं हुआ था, उसके पहले डॉ. बुदरी ताती बचत गट्टा के नाम पर समूह बनाकर महिलाओं को बचत के लिए प्रोत्साहित करती थीं। आज सैकड़ों महिलाएं इस समूह की सदस्य हैं।
आजीवन अविवाहित रहकर सेवा का संकल्प लिया
बुदरी के जन्म के एक वर्ष बाद ही उनके पिता चैतू ताती का निधन हो गया। मां सोनी ताती ने कठिन परिस्थितियों में अपने चार बच्चों का पालन-पोषण किया। भाई-बहनों में सबसे छोटी बुदरी छह वर्ष की उम्र में ही गुमरगुंडा स्थित सदा प्रेमानंद महाराज के आश्रम पहुंच गईं थीं। महाराज वनवासी कल्याण और शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत थे तथा ताती परिवार के रिश्तेदार भी थे।
ताती ने 10वीं कक्षा तक शिक्षा प्राप्त की। आगे पढ़कर नौकरी करने का अवसर था, लेकिन वनवासियों की दयनीय स्थिति ने उन्हें व्यथित कर दिया। आश्रम में दूर-दूर से आने वाले बच्चों को देख उन्होंने आजीवन अविवाहित रहकर सेवा का संकल्प लिया। बड़े भाई सुखदेव ताती भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़कर समाजकार्य कर रहे थे।
डायरेक्ट्रेट की उपाधि से सम्मानित
छत्तीसगढ़ सरकार ने डॉ. बुदरी ताती को 2007 में मिनी माता पुरस्कार और पंडित सुंदरलाल शर्मा मुक्त विश्वविद्यालय ने 2017 में डायरेक्ट्रेट की उपाधि से सम्मानित किया है। स्थानीय स्तर पर उन्हें अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है। कई स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा समाज सेवा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य के लिए उनको सम्मान दिया गया है।




