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तकनीक व बदली मानसिकता ने पलटी माओवादियों के खिलाफ लड़ाई की दिशा, दो वर्षों में 498 नक्सली ढेर

छत्तीसगढ़ के बस्तर में माओवादियों के खिलाफ अभियान की दिशा बदल गई है। सुरक्षाबल अब उनके गढ़ में घुसकर चुनौती दे रहे हैं। कर्रेगुट्टा जैसे अभियानों में NTRO की तकनीक और स्थानीय बलों के समन्वय से बड़ी सफलता मिली है।

छत्तीसगढ़ और तेलंगाना की सीमा पर तपती दोपहर। तापमान 40 डिग्री सेल्सियस के पार और सामने कर्रेगुट्टा की खड़ी पहाड़ी। कंधों पर 25 से 30 किलो का बोझ, हाथों में हथियार और चार किलोमीटर लंबी कठिन चढ़ाई। कई जगह जवानों को रस्सियों के सहारे ऊपर चढ़ना पड़ा। यह दृश्य बस्तर में उस बदलती लड़ाई की कहानी कहता है, जिसने माओवादियों के चार दशक पुराने ढांचे को झकझोरा ही नहीं, बल्कि पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया है।

दरअसल, अब बस्तर में माओवादियों के खिलाफ अभियान केवल जवाबी कार्रवाई तक सीमित नहीं रह गया है। सुरक्षाबल अब माओवादियों के गढ़ में घुसकर उन्हें चुनौती दे रहे हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण 21 अप्रैल से 11 मई 2025 के बीच चला कर्रेगुट्टा अभियान है। करीब 21 दिनों तक चले इस बड़े ऑपरेशन में लगभग 10 हजार जवानों ने हिस्सा लिया।

राष्ट्रीय तकनीकी अनुसंधान संगठन (एनटीआरओ) के सेटेलाइट इनपुट के आधार पर सुरक्षाबलों ने माओवादियों के चार दशक पुराने सुरक्षित ठिकाने का पता लगाया। भीषण गर्मी, पानी की कमी और बेहद कठिन भौगोलिक स्थिति के बीच दिन-रात चलाए गए इस अभियान में नाइट विजन उपकरणों व अत्याधुनिक हथियारों से लैस जवानों ने माओवादियों के एक बड़े शस्त्रागार को ध्वस्त कर दिया। इस दौरान 27 माओवादी मारे गए।

माओवादी विरोधी अभियान की सफलता के पीछे रणनीति, तकनीक और स्थानीय बलों का समन्वय सबसे बड़ा कारण है। उनका कहना है कि अब अभियान केवल प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि इंटेलिजेंस आधारित और निरंतर दबाव की रणनीति पर चल रहे हैं। यही वजह है कि जंगलों के भीतर भी अब सुरक्षाबलों की बढ़त साफ दिखाई देने लगी है।

– सुंदरराज पी., बस्तर आईजीपी

इस अभियान में अग्रिम पंक्ति में रहे डीआरजी (जिला रिजर्व गार्ड) के जवान धरमसिंह तुलामी, जो कभी माओवादी संगठन का हिस्सा थे और बाद में आत्मसमर्पण कर पुलिस बल में शामिल हुए, कहते हैं कि सरकार की दृढ़ इच्छाशक्ति, आधुनिक हथियारों और तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल ने माओवादी मोर्चे पर लड़ाई का पलड़ा बदल दिया है।

बदली रणनीति से फतह किया मोर्चा

सुरक्षा एजेंसियों के आंकड़ों के अनुसार, बस्तर में इस अवधि के दौरान 12 हजार से अधिक अभियान चलाए गए, जिनमें लगभग 300 अभियान पुख्ता इंटेलिजेंस पर आधारित थे। इन अभियानों के दौरान 226 मुठभेड़ें हुईं, जिनमें 485 माओवादी मारे गए। इनमें संगठन के 10 शीर्ष माओवादी हिंसक भी शामिल थे। इसके अलावा 1936 माओवादी गिरफ्तार किए गए, जबकि 2,650 ने आत्मसमर्पण किया।

इन अभियानों में 1,044 हथियार, जिनमें एके-47 और इंसास राइफल शामिल हैं, जब्त किए गए। साथ ही 1,395 विस्फोटक भी बरामद किए गए।

इंटेलिजेंस और तकनीक ने बदली लड़ाई

माओवादी विरोधी अभियान की दिशा बदलने में तकनीक और स्थानीय बलों की भूमिका भी निर्णायक रही है। एनटीआरओ के सेटेलाइट इनपुट, ड्रोन निगरानी और जीपीएस ट्रैकिंग जैसी तकनीकों ने जंगलों में छिपे माओवादी ठिकानों को उजागर करने में पहले की तुलना में कहीं अधिक आसान बना दिया है। दो साल पहले जवानों को हथियार, आधुनिक गैजेट व मेडिकल किट उपलब्ध कराए गए हैं, जिससे उनकी ताकत बढ़ी है।

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