अपराध

सुनील रावत की सफलता साबित करती है कि पुलिस की तकनीकी दक्षता अब साइबर अपराधों पर भारी पड़ रही है।

(वक्ता — एक स्थानीय हॉकी खिलाड़ी, जो आरक्षी सुनील रावत को व्यक्तिगत रूप से जानता है)

मैं जब पहली बार सुनील भैया से मिला था, तब वे हमें पुलिस लाइन के ग्राउंड पर हॉकी सिखा रहे थे।
वो सादे कपड़ों में थे, और चेहरे पर हमेशा मुस्कान रहती थी।
तब नहीं पता था कि यह वही इंसान हैं जो एक दिन पूरे जनपद में “कॉप ऑफ द मंथ” के रूप में पहचाने जाएँगे।

सुनील भैया का काम करने का तरीका हमेशा अलग रहा।
वो कहते थे — “खेल में अनुशासन ज़रूरी है, और ड्यूटी में ईमानदारी।”
उनकी यही बात आज याद आती है, जब मैंने खबर पढ़ी कि उन्होंने साइबर अपराध से ठगे गए ₹10,02,027 की रकम वापस दिलाई और 42 लोगों की ज़िंदगी में उम्मीद लौटाई।

एक खिलाड़ी की तरह उन्होंने मैदान छोड़ा नहीं, बस खेल बदल गया —
पहले हॉकी का, अब साइबर अपराध का।
पर रणनीति वही रही —
धैर्य, तकनीक की समझ और जीतने की जिद्द।

मुझे याद है, कई बार मैच के बाद वो हमसे कहते थे —
“जीत वही होती है, जिसमें सबकी खुशी शामिल हो।”
शायद यही वजह है कि जब उन्होंने किसी पीड़ित का पैसा वापस दिलाया होगा, तो वो सिर्फ एक केस नहीं, बल्कि किसी परिवार की जीत रही होगी।

जब उन्हें पुलिस अधीक्षक अभिषेक वर्मा सर ने ‘कॉप ऑफ द मंथ’ घोषित किया, तब पूरे सोनभद्र की गर्व भरी तालियाँ उनके सम्मान में गूंजीं।
उनके चेहरे पर वही पुरानी मुस्कान थी — वही जो वो तब दिखाते थे जब हमें हॉकी में गोल करने की तारीफ देते थे।

आज जब मैं मैदान में अभ्यास करता हूँ, तो सोचता हूँ —
अगर पुलिस का हर सिपाही सुनील भैया जैसा बने, तो समाज का मैदान भी अपराध रहित हो जाएगा।

उनका यह काम बताता है कि वर्दी केवल कानून की नहीं, विश्वास की भी होती है।
उन्होंने दिखाया कि तकनीक अगर अपराधियों के हाथ में हथियार है, तो ईमानदार पुलिसकर्मी के हाथ में रक्षा कवच भी।

मैं गर्व से कह सकता हूँ —
मैं उस जिले से हूँ जहाँ एक आरक्षी ने सिर्फ पैसे नहीं, लोगों का विश्वास भी वापस दिलाया।
और यह प्रेरणा मेरे जैसे खिलाड़ियों के लिए उतनी ही बड़ी है, जितनी किसी पदक की चमक।

क्योंकि अंततः जीत उसी की होती है,
जो दूसरों की हार को अपनी जिम्मेदारी समझे —
और यही सुनील रावत की असली पहचान है।

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