सम्पादकीय
बस्तर का जंगल अब बंदूकों का नहीं, बल्कि लाइट, कैमरा और क्रिएटिव एक्शन का गवाह बन रहा है।

बस्तर में फिल्म शूटिंग का बढ़ा आकर्षण
माओवादी हिंसा से प्रभावित बस्तर अब फिल्ममेकर्स की नई पसंद बन रहा है। ‘माटी’, ‘दण्डा कोटुम’ जैसी फिल्मों की शूटिंग ने यहां के जंगलों में नई जान फूंक दी है।
प्राकृतिक लोकेशन बनी पहचान
दक्षिण बस्तर, अबूझमाड़ से लेकर ढोलकल तक, यहां की पहाड़ियां, झरने और अनछुई खूबसूरती फिल्मकारों को खींच रही हैं।
स्थानीय कलाकारों को अवसर
150 सदस्यीय फिल्म यूनिट में स्थानीय युवक, महिलाएं और कलाकार शामिल हैं। गांवों में पहली बार लाइट, कैमरा और मेकअप की रौनक दिखी।
ऐतिहासिक फिल्में भी बनीं बस्तर में
1957 की स्वीडिश फिल्म ‘द जंगल सागा’ और 1980 की ‘कस्तूरी’ यहीं फिल्माई गई थीं। नूतन, मिथुन और देव आनंद जैसे कलाकार यहां आ चुके हैं।
फिल्म पर्यटन का भविष्य
बस्तर में फिल्म शूटिंग बढ़ने से पर्यटन, रोजगार और स्थानीय संस्कृति को नई पहचान मिल रही है।




