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कोरबा में परीक्षा तनाव से तीन दिन में 4 स्टूडेंट्स ने की आत्महत्या, मानसिक दबाव लेकर खड़े हुए गंभीर सवाल

कोरबा जिले में तीन दिन के भीतर चार छात्र-छात्राओं ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। ये घटनाएं परीक्षा अवधि के दौरान हुईं, जिससे बच्चों पर पढ़ाई और मानसिक दबाव का गंभीर सवाल खड़ा हो गया है। मृतकों में नौवीं, दसवीं और बारहवीं कक्षा के विद्यार्थी शामिल हैं। मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने अभिभावकों को बच्चों से खुलकर बात करने, दबाव न बनाने और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ की मदद लेने की सलाह दी है।

जिले में बीते तीन दिन के अंदर चार छात्र-छात्राओं ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली है। इस घटना से बच्चे के अभिभावक तो शोक में डूब ही गए हैं। साथ ही क्षेत्र के लोग भी स्तब्ध हैं।

जान देने वाले छात्र में 12 वीं कक्षा के दो, 10 वीं कक्षा और नौवीं कक्षा की एक-एक छात्रा शामिल हैं। सभी घटनाएं परीक्षा अवधि के दौरान सामने आई हैं, जिससे बच्चों पर पढ़ाई और मानसिक दबाव को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

पहली घटना उरगा थाना क्षेत्र के धमनागुड़ी मोहार गांव की है। जहां सोमवार की रात नौवीं की 16 वर्षीय छात्रा गीता महंत ने तालाब किनारे पेड़ में फांसी लगा ली। बताया गया कि मां के निधन के बाद से वह मानसिक रूप से परेशान थी।

दूसरी घटना मंगलवार को सिटी कोतवाली थाना क्षेत्र के इंदिरानगर दुरपा में कक्षा 10 वीं की छात्रा अंजली केंवट 17 वर्ष ने घर में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। वह बोर्ड परीक्षा की तैयारी कर रही थी और उस समय घर पर अकेली थी।

इसी क्रम में सिविल लाइन थाना क्षेत्र के रामपुर आईटीआई बस्ती में 12वीं के छात्र उज्ज्वल डडसेना उर्फ ध्रुव 17 वर्ष ने घर के कमरे में पंखे से फांसी लगाकर जान दे दी। वह एक प्रतिष्ठित स्कूल का छात्र और कक्षा नायक (मानिटर) था। परीक्षा के दिन स्कूल नहीं पहुंचने पर शिक्षकों द्वारा घर पहुंचने पर यह घटना सामने आई। मौके से अंग्रेजी में लिखा सुसाइड नोट भी बरामद हुआ है।

सिविल लाइन थाना क्षेत्र अंतर्गत ही सीएसईबी कालोनी में निवासरत छात्र दीपांशु कौशिक ने घर में अकेले रहते हुए आत्महत्या कर ली। वह कक्षा 12 वीं का छात्र था और परीक्षा की तैयारी में जुटा हुआ था। लगातार चार घटनाओं से जिले में शोक और चिंता का माहौल है।

मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि किशोर अवस्था में पढ़ाई, परीक्षा, पारिवारिक परिस्थितियां और अपेक्षाओं का दबाव बच्चों को भीतर ही भीतर तोड़ देता है। ऐसे में समय रहते संवाद और भावनात्मक सहयोग बेहद जरूरी है।

अभिभावकों के लिए

  • बच्चों से रोज खुलकर बातचीत करें और उनकी बातों को गंभीरता से सुनें।
  • पढ़ाई, परीक्षा और परिणाम को लेकर अत्यधिक दबाव न बनाएं।
  • बच्चों की तुलना दूसरों से न करें, हर बच्चे की क्षमता अलग होती है।
  • तनाव, उदासी, चिड़चिड़ापन या अकेले रहने जैसे लक्षण दिखें तो तुरंत विशेषज्ञ की मदद लें।
  • बच्चों को यह भरोसा दिलाएं कि किसी भी परिस्थिति में परिवार उनके साथ खड़ा है।

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