ईरान-इजरायल युद्ध का असर: खाड़ी में जाम होने लगा GPS, जहाज और विमान की लोकेशन हो रही गड़बड़

ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते सैन्य तनाव का असर अब केवल युद्धक्षेत्र तक सीमित नहीं रहा है। इसका प्रभाव खाड़ी क्षेत्र की समुद्री और हवाई आवाजाही पर भी साफ दिखाई देने लगा है। अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों के बाद खाड़ी देशों में जीपीएस सिग्नल बड़े पैमाने पर बाधित हो गए हैं। इससे जहाजों और विमानों के नेविगेशन सिस्टम प्रभावित हो रहे हैं और उनकी लोकेशन गलत दिखाई दे रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि जीपीएस सिग्नल में हो रही छेड़छाड़ और जैमिंग से अंतरराष्ट्रीय व्यापार, समुद्री सुरक्षा और हवाई उड़ानों के लिए गंभीर खतरा पैदा हो सकता है।
24 घंटे के भीतर हजारों जहाज प्रभावित
शिपिंग इंटेलिजेंस फर्म विंडवर्ड की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों के सिर्फ 24 घंटों के भीतर ही खाड़ी क्षेत्र में 1,100 से अधिक वाणिज्यिक जहाजों के नेविगेशन सिस्टम प्रभावित हुए।
यह समस्या खास तौर पर संयुक्त अरब अमीरात, कतर, ओमान और ईरान के आसपास के समुद्री इलाकों में देखी गई। कई जहाजों की लोकेशन अचानक बदलकर किसी एयरपोर्ट, ईरान की जमीन या किसी परमाणु संयंत्र के पास दिखाई देने लगी।
यह स्थिति समुद्री सुरक्षा के लिहाज से बेहद चिंताजनक मानी जा रही है।
होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ी परेशानी
खाड़ी क्षेत्र का सबसे संवेदनशील इलाका होर्मुज जलडमरूमध्य है। यह दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में से एक है और यहां से दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल और गैस का निर्यात होता है।
जब यहां जीपीएस सिग्नल में गड़बड़ी शुरू हुई तो जहाजों की आवाजाही लगभग ठप हो गई। कई जहाजों को अपनी दिशा बदलनी पड़ी, जबकि कुछ जहाजों ने सुरक्षा कारणों से अपना एआईएस सिस्टम बंद कर दिया।
एआईएस यानी ऑटोमैटिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम जहाजों की लोकेशन और गति की जानकारी देता है, जिससे समुद्र में टक्कर से बचाव किया जा सके।
जीपीएस स्पूफिंग और जैमिंग की बढ़ती घटनाएं
लॉयड्स लिस्ट इंटेलिजेंस के आंकड़ों के अनुसार, युद्ध शुरू होने से लेकर 3 मार्च तक कुल 655 जहाजों पर 1,735 जीपीएस छेड़छाड़ की घटनाएं दर्ज की गईं।
इन घटनाओं में लगातार तेजी देखी जा रही है और लगभग हर दिन इनकी संख्या दोगुनी हो रही है।
जीपीएस स्पूफिंग का मतलब होता है कि जहाज के नेविगेशन सिस्टम को नकली सिग्नल भेजकर उसकी वास्तविक लोकेशन को बदल देना। जबकि जैमिंग में जीपीएस सिग्नल को पूरी तरह बाधित कर दिया जाता है।
सैन्य रणनीति का हिस्सा है जैमिंग
विशेषज्ञों के अनुसार, जीपीएस जैमिंग का इस्तेमाल आमतौर पर सैन्य रणनीति के तहत किया जाता है। युद्ध के दौरान इसका उद्देश्य दुश्मन के ड्रोन, मिसाइल और अन्य हथियारों को भ्रमित करना होता है।
हालांकि इसका दुष्प्रभाव नागरिक जहाजों और विमानों पर भी पड़ता है। जब जीपीएस सिग्नल गड़बड़ा जाते हैं तो पायलट और जहाज चालक सही दिशा का अनुमान नहीं लगा पाते।
जहाजों की सुरक्षा पर बड़ा खतरा
विंडवर्ड की वरिष्ठ विश्लेषक मिशेल वीसे बोक्मैन ने CNN से बातचीत में कहा कि इस तरह की घटनाएं समुद्री सुरक्षा के लिए बेहद खतरनाक हैं।
उनका कहना है कि जब जहाजों की लोकेशन हजारों मील दूर या जमीन पर दिखाई देने लगती है तो यह समझना मुश्किल हो जाता है कि जहाज वास्तव में कहां है।
एआईएस सिस्टम का मुख्य उद्देश्य जहाजों के बीच टक्कर से बचाव करना होता है। लेकिन जब लोकेशन ही गलत दिखाई दे तो दुर्घटना का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
विमानों के लिए भी बढ़ा खतरा
यह समस्या केवल समुद्र तक सीमित नहीं है। जीपीएस सिग्नल में हो रही गड़बड़ी का असर विमानों पर भी पड़ रहा है।
अंतरराष्ट्रीय एयर ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन के आंकड़ों के अनुसार, 2021 से 2024 के बीच विमानों में जीपीएस सिग्नल लॉस की घटनाओं में 220 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।
पायलटों को नकली ऊंचाई के संकेत, फाल्स अलार्म और गलत लोकेशन जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।
“इलेक्ट्रॉनिक फॉग” बनती जा रही समस्या
रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ नेविगेशन के निदेशक रामसे फराघर ने इस स्थिति को “इलेक्ट्रॉनिक फॉग” यानी इलेक्ट्रॉनिक धुंध बताया है।
उनका कहना है कि जब जीपीएस सिग्नल बार-बार बाधित होते हैं तो पायलट और जहाज चालक के लिए वास्तविक स्थिति को समझना मुश्किल हो जाता है।
यह समस्या खास तौर पर युद्ध क्षेत्रों में आम होती जा रही है।
वैश्विक व्यापार पर पड़ सकता है असर
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि खाड़ी क्षेत्र में जीपीएस जैमिंग और स्पूफिंग की घटनाएं लंबे समय तक जारी रहती हैं तो इसका असर वैश्विक व्यापार पर भी पड़ सकता है।
क्योंकि दुनिया के बड़े हिस्से का तेल और गैस इसी क्षेत्र से होकर गुजरता है। यदि जहाजों की आवाजाही प्रभावित होती है तो ऊर्जा आपूर्ति पर भी असर पड़ सकता है।
बढ़ता तकनीकी युद्ध
ईरान और इजरायल के बीच चल रहे संघर्ष में अब तकनीकी युद्ध भी अहम भूमिका निभा रहा है। साइबर हमले, इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग और ड्रोन युद्ध जैसी रणनीतियां लगातार बढ़ती जा रही हैं।
ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में जीपीएस जैमिंग जैसी घटनाएं और बढ़ सकती हैं।




