Iran Israel Conflict: ऊपर से बरस रही आग, नीचे पानी का संकट… युद्ध के बीच दोहरी मार झेल रहा ईरान

ईरान युद्ध और गंभीर जल संकट की दोहरी मार झेल रहा है। जलवायु परिवर्तन, अत्यधिक कृषि उपयोग और कुप्रबंधन ने देश को सूखे की कगार पर धकेल दिया है।
HighLights
- ईरान युद्ध और गंभीर जल संकट की दोहरी मार झेल रहा
- डिसेलिनेशन प्लांट पर हमलों से जल आपूर्ति प्रभावित हुई
- गलत नीतियों और सूखे से तेहरान में गहराया जल संकट
ईरान इस समय दोहरी मार झेल रहा है एक तरफ युद्ध का दबाव और दूसरी तरफ गहराता जल संकट। जलवायु परिवर्तन, खेती में अत्यधिक पानी की खपत और दशकों के कुप्रबंधन ने पहले ही देश को सूखे की कगार पर पहुंचा दिया था। अब युद्ध ने इस संकट को और खतरनाक बना दिया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि हालात ऐसे ही रहे तो आने वाले समय में पानी की कमी ईरान के लिए किसी बड़े मानवीय संकट का रूप ले सकती है। हाल ही में ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अर्घची ने अमेरिका पर केशम द्वीप स्थित डिसेलिनेशन प्लांट पर बमबारी का आरोप लगाया।
ईरान में गहराता जल संकट
यह संयंत्र समुद्री पानी को मीठा बनाकर आसपास के इलाकों में आपूर्ति करता था। हमले के बाद करीब 30 गांवों की जल आपूर्ति प्रभावित होने की बात कही गई है। हालांकि अमेरिका ने इस आरोप से इनकार किया है।
इसके बाद ईरान ने बहरीन में एक डिसेलिनेशन संयंत्र पर हमला कर जवाब दिया, जिससे पूरे पर्शियन गल्फ क्षेत्र में जल ढांचे पर हमलों की आशंका और बढ़ गई है।सूखे की चपेट में तेहरानकरीब एक करोड़ की आबादी वाला तेहरान पिछले कई वर्षों से सूखे की मार झेल रहा है।

पिछले साल देश में औसत वर्षा सामान्य से लगभग 45 प्रतिशत कम रही। राजधानी को पानी देने वाले कई बांध और जलाशय अब न्यूनतम स्तर पर पहुंच चुके हैं। ईरान के मौसम विभाग ने चेतावनी दी है कि कई शहर वाटर डे-जीरो की स्थिति के करीब हैं यानी वह समय जब जल आपूर्ति व्यवस्था पूरी तरह ठप हो सकती है।
राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान ने यहां तक कहा था कि घटते जल संसाधनों और पर्यावरणीय दबावों के कारण तेहरान धीरे-धीरे रहने योग्य नहीं रह गया है और राजधानी को कहीं और स्थानांतरित करने पर भी विचार करना पड़ सकता है।
गलत नीतियों ने बढ़ाई मुसीबत
विशेषज्ञों का मानना है कि यह संकट केवल मौसम की देन नहीं है, बल्कि दशकों की गलत नीतियों का परिणाम भी है। 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद जल आत्मनिर्भरता के नाम पर ईरान में बड़े पैमाने पर बांध और जलाशय बनाए गए, लेकिन कई परियोजनाएं गलत स्थानों पर खड़ी कर दी गईं। बढ़ती गर्मी ने इन जलाशयों में पानी के तेजी से वाष्पीकरण को और बढ़ा दिया।
2024 के एक अध्ययन के अनुसार दुनिया के 50 सबसे अधिक दोहन किए जा रहे भूजल भंडारों में से 32 अकेले ईरान में हैं। यानी देश अपने भूमिगत जल को तेजी से खाली कर रहा है। संकट से निपटने के लिए सरकार ने ओमान की खाड़ी से पानी आयात करने जैसे दीर्घकालिक उपायों की चर्चा जरूर की है, लेकिन अभी तक इस दिशा में ठोस प्रयास नहीं हो पाए हैं।

(यह तस्वीर AI से जेनेरेट की गई है)
विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि युद्ध और सूखा साथ-साथ बढ़ते रहे तो ईरान में खाद्य संकट, आर्थिक दबाव और बड़े पैमाने पर पलायन की स्थिति पैदा हो सकती है। ऐसे में आने वाले समय में ईरान के सामने केवल युद्ध की चुनौती ही नहीं, बल्कि पानी की जंग भी खड़ी है।




