रुपया 139 पैसे गिरकर अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 94.90 पर पहुंचा

नई दिल्ली। भारतीय रुपया शुक्रवार को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 139 पैसे गिरकर 94.90 के स्तर पर आ गया। विदेशी मुद्रा व्यापारी और विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिकी डॉलर की मजबूती और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) द्वारा भारी पूंजी निकासी ने स्थानीय मुद्रा पर दबाव बढ़ाया है।
विदेशी मुद्रा बाजार में रुपया पिछले कुछ हफ्तों से लगातार कमजोर होता जा रहा है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि अमेरिकी डॉलर वैश्विक स्तर पर मजबूत हो रहा है, साथ ही अमेरिका में ब्याज दरों में संभावित वृद्धि के संकेत ने निवेशकों को डॉलर की ओर आकर्षित किया है। इसके चलते भारत जैसे उभरते बाजारों से पूंजी बाहर निकल रही है, जिससे रुपया दबाव में आ गया है।
विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने बड़े पैमाने पर भारतीय शेयर एवं बॉन्ड बाजार से निकासी की है, जो रुपये के कमजोर होने का एक प्रमुख कारण माना जा रहा है। इससे भारतीय बाजार में विदेशी मुद्रा की कमी के साथ-साथ मांग और आपूर्ति में असंतुलन भी देखने को मिला।
फॉरेक्स ट्रेडर्स ने बताया कि समग्र आर्थिक संकेतकों पर नजर रखने के साथ-साथ विदेशी निवेश प्रकिया में हो रही तेजी बदलावों की भी भूमिका है, जो रुपये के अवमूल्यन के पीछे है। उन्होंने कहा, “अमेरिकी डॉलर के मजबूत होने और एफपीआई निकासी के चलते स्थानीय मुद्रा दबाव में है।”
विश्लेषकों ने सुझाव दिया है कि सरकार और रिजर्व बैंक को कारोबारी और निवेशक हितों को सुरक्षित रखने के लिए सतर्कता बरतनी होगी। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के कदम भी रुपये की गिरावट को रोकने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
अंतरराष्ट्रीय बाजारों और विदेशी व्यापार के लिए भारतीय रुपया महत्वपूर्ण है, अतः इसके समाधान के लिए उचित नीतिगत उपायों की आवश्यकता है। निवेशकों को भी ऐसे समय में सतर्कता और धैर्य बनाये रखने की सलाह दी जाती है।
इस गिरावट का असर ऐतिहासिक रुप से मुद्रास्फीति और आयातित वस्तुओं की कीमतों पर पड़ सकता है, जिससे उपभोक्ता और उद्योग दोनों प्रभावित होंगे। सरकारी अधिकारियों ने इस स्थिति पर नजर बनाए रखी हुई है और आवश्यकतानुसार कदम उठाने की बात कही है।
रुपया की कमजोर स्थिति को देखते हुए विशेषज्ञ आगामी हफ्तों में भी स्थिति में उतार-चढ़ाव की संभावना पर जोर दे रहे हैं। विदेशी मुद्रा बाजार और वैश्विक आर्थिक माहौल के आधार पर रुपये के दाम में सुधार या गिरावट दोनों संभावित हैं।
इसलिए, आर्थिक नीति निर्धारकों के साथ-साथ निवेशकों को भी वैश्विक और घरेलू वित्तीय संकेतकों की बारीकी से समीक्षा करनी होगी और सतर्कता से निर्णय लेना होगा।




