ईरान बनाम अमेरिका: लाइव फायरिंग अभ्यास के पीछे क्या है असली मंशा?

तनाव की पृष्ठभूमि
ईरान इस समय अपने इतिहास के सबसे चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रहा है। एक तरफ देश के भीतर सरकार विरोधी प्रदर्शन लगातार तेज होते जा रहे हैं, तो दूसरी ओर गिरती अर्थव्यवस्था ने आम जनता की परेशानियां बढ़ा दी हैं। महंगाई, बेरोजगारी और ईरानी मुद्रा की कमजोरी ने जनता में गुस्सा भर दिया है। इन आंतरिक संकटों के बीच अमेरिका के साथ बढ़ता टकराव हालात को और विस्फोटक बना रहा है।
पिछले कुछ हफ्तों से ईरान के कई शहरों में प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच झड़पों की खबरें सामने आ रही हैं। मानवाधिकार संगठनों के अनुसार, इन प्रदर्शनों में सैकड़ों नहीं बल्कि हजारों लोगों की जान जा चुकी है। अमेरिका ने इन घटनाओं को गंभीरता से लेते हुए ईरान को खुली चेतावनी दी है, जिससे दोनों देशों के रिश्तों में और कड़वाहट आ गई है।
सैन्य अभ्यास का ऐलान
इन्हीं हालातों के बीच ईरान ने अपने तटवर्ती और सीमावर्ती इलाकों में लाइव फायरिंग सैन्य अभ्यास शुरू करने का ऐलान किया है। यह अभ्यास फारस की खाड़ी के तट, इराक और अजरबैजान से सटे क्षेत्रों में किए जा रहे हैं। इन इलाकों को रणनीतिक दृष्टि से बेहद अहम माना जाता है क्योंकि यहीं से ईरान का बड़ा तेल और गैस व्यापार संचालित होता है।
सैन्य अभ्यास में एंटी-एयरक्राफ्ट गनों का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिनका मकसद दुश्मन विमानों को निशाना बनाना होता है। रक्षा जानकारों का कहना है कि इन अभ्यासों का उद्देश्य केवल प्रशिक्षण नहीं, बल्कि अमेरिका और उसके सहयोगी देशों को यह दिखाना है कि ईरान किसी भी संभावित हमले के लिए तैयार है।
रणनीतिक ठिकानों पर खास नजर
ईरान ने जिन इलाकों को अभ्यास के लिए चुना है, वे सामान्य नहीं हैं। फार्स गैस फील्ड, असालूयेह एयरबेस, लावन द्वीप और चाबहार बंदरगाह जैसे क्षेत्र ईरान की ऊर्जा और व्यापारिक रीढ़ माने जाते हैं। इन स्थानों पर सैन्य गतिविधियों का बढ़ना इस बात का संकेत है कि ईरान अपने अहम संसाधनों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रहा है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि इन ठिकानों पर अभ्यास कर ईरान यह संदेश देना चाहता है कि अगर उस पर दबाव बढ़ाया गया, तो इसका असर सिर्फ क्षेत्रीय नहीं बल्कि वैश्विक स्तर पर पड़ेगा, खासकर तेल आपूर्ति और समुद्री व्यापार पर।
NOTAM से बढ़ी चिंता
सैन्य अभ्यास के साथ-साथ ईरान की विमानन एजेंसियों ने कई NOTAM (नोटिस टू एयरमैन) जारी किए हैं। इन नोटिसों में पायलटों को दक्षिणी और उत्तर-पश्चिमी ईरान के कुछ हिस्सों में उड़ान न भरने या 17 हजार फीट से नीचे न उड़ने की चेतावनी दी गई है।
इस कदम से न केवल ईरान के घरेलू हवाई यातायात पर असर पड़ा है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए भी चिंता बढ़ गई है। विमानन विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के नोटिस आमतौर पर तभी जारी किए जाते हैं जब किसी क्षेत्र में वास्तविक सैन्य गतिविधि चल रही हो या उसके आसार हों।
अमेरिकी प्रतिक्रिया
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान की कार्रवाई पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा है कि अगर ईरानी सरकार प्रदर्शनकारियों पर हिंसा जारी रखती है, तो अमेरिका सख्त सैन्य कार्रवाई से पीछे नहीं हटेगा। ट्रंप पहले भी ईरान को लेकर आक्रामक रुख अपनाते रहे हैं, लेकिन इस बार उनकी चेतावनी को पहले से ज्यादा गंभीर माना जा रहा है।
अमेरिका का यह बयान ऐसे समय आया है जब मध्य पूर्व पहले से ही कई संघर्षों की आग में झुलस रहा है। ऐसे में ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ता तनाव पूरे क्षेत्र की स्थिरता के लिए खतरा बन सकता है।
विशेषज्ञों की राय
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान का यह सैन्य अभ्यास सीधे तौर पर युद्ध की तैयारी नहीं है, बल्कि एक रणनीतिक चेतावनी है। भारतीय सेना के पूर्व अधिकारियों के अनुसार, इस्तेमाल की जा रही एंटी-एयरक्राफ्ट गन आधुनिक फाइटर जेट्स को गिराने में पूरी तरह सक्षम नहीं हैं, लेकिन ये अमेरिकी विमानों को ऊंचाई पर उड़ने के लिए मजबूर कर सकती हैं।
विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि ईरान दबाव की राजनीति अपना रहा है—ताकि अमेरिका और उसके सहयोगी किसी भी सैन्य कार्रवाई से पहले सौ बार सोचें। हालांकि, हालात जिस तेजी से बदल रहे हैं, उसे देखते हुए किसी भी बड़े टकराव की संभावना से पूरी तरह इनकार भी नहीं किया जा सकता।
निष्कर्ष
कुल मिलाकर, ईरान का लाइव फायरिंग सैन्य अभ्यास उसकी असली मंशा को साफ करता है—वह न केवल अपने आंतरिक संकटों से जूझ रहा है, बल्कि बाहरी दबावों के सामने झुकने के मूड में भी नहीं है। अमेरिका की धमकियों और ईरान की सैन्य तैयारियों के बीच आने वाले दिन यह तय करेंगे कि यह तनाव सिर्फ चेतावनी तक सीमित रहेगा या किसी बड़े संघर्ष की शक्ल ले लेगा।




