बंगाल की सियासत में भाजपा का उभार: वाम के पतन से लेकर तृणमूल को सीधी चुनौती तक का सफर

कोलकाता:
पश्चिम बंगाल की राजनीति में पिछले एक दशक के दौरान बड़ा बदलाव देखने को मिला है। कभी हाशिए पर रही भारतीय जनता पार्टी अब राज्य की मुख्य विपक्षी ताकत बनकर उभरी है और सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस को सीधे तौर पर चुनौती दे रही है।
भाजपा का शुरुआती दौर बंगाल में बेहद कमजोर रहा। 1990 के दशक और 2000 के शुरुआती वर्षों में पार्टी का वोट प्रतिशत 8 से 11 प्रतिशत के बीच रहा। 1999 से 2001 के बीच तृणमूल कांग्रेस के साथ गठबंधन ने भाजपा को राज्य में कुछ पहचान जरूर दिलाई, लेकिन यह प्रभाव लंबे समय तक कायम नहीं रह सका।
2004 से 2009 के बीच पार्टी का प्रदर्शन गिरा और वोट प्रतिशत घटकर 6 से 8 प्रतिशत तक आ गया। उस समय राज्य में वाम मोर्चा का मजबूत दबदबा था और तृणमूल कांग्रेस मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभर रही थी।
2011 का विधानसभा चुनाव बंगाल की राजनीति के लिए टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ। ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस ने 34 साल पुराने वाम शासन को समाप्त कर दिया। इसके बाद वाम दलों का आधार तेजी से कमजोर हुआ और भाजपा के लिए नई संभावनाएं बनीं।
2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 17 प्रतिशत वोट हासिल किए और दो सीटें जीतीं। इसके बाद 2019 में पार्टी ने 18 सीटें जीतकर लगभग 40 प्रतिशत वोट प्राप्त किए। यह प्रदर्शन भाजपा के लिए ऐतिहासिक रहा।
2021 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 77 सीटें हासिल कर मुख्य विपक्षी पार्टी का दर्जा प्राप्त किया। इस दौरान उसका वोट प्रतिशत 38 प्रतिशत तक पहुंच गया, जो 2016 के 10 प्रतिशत के मुकाबले काफी अधिक था।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा ने वाम और कांग्रेस के कमजोर पड़ते आधार का लाभ उठाया। साथ ही, पार्टी ने स्थानीय मुद्दों को उठाकर और संगठन को मजबूत करके अपनी पकड़ बढ़ाई।
आने वाले चुनावों में मुकाबला और भी कड़ा होने की संभावना है। तृणमूल कांग्रेस जहां अपने जनाधार को बनाए रखने की कोशिश में है, वहीं भाजपा अपने विस्तार को और तेज करने में जुटी है।




